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कहते हैं जीवन में प्रत्येक क्षण और घड़ी का उसके सबसे छोटे कण का महत्त्व होता है आपने दिन महीनों और सालों यहाँ तक सदी के बारे में पहले भी पढ़ा होगा आज हम छोटे से क्षण से लेकर युग और उससे भी आगे बहुत आगे के काल को समझेंगें I  

60 सेकंड का एक मिनट, 60 मिनट का एक घंटा, 3 घंटे का एक प्रहर और 4 प्रहर का एक दिन और 4 प्रहर की एक रात्रि होती है I ऐसे ही 15 दिन का एक पक्ष और दो पक्ष का एक महीना – शुक्लपक्ष और कृष्ण पक्ष होता है I दो माह की एक ऋतु, 3 ऋतुओं का एक अयन होता है और दो अयन का एक वर्ष होता है जिसे उत्तरायण और दक्षिणायण कहते हैं I सेकंड से लेकर वर्ष तक का गणित ही काफ़ी नहीं आगे का हिसाब करते जाना है और इसका कैसे ब्रह्मा जी के साथ संबंध है वो जानना आवश्यक है I  

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कल्प, मन्वन्तर और युगों का गणित

युगों की बात करें तो धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कुल चार युग माने गए हैं इनमें पहला सतयुग लगभग 17 लाख 28 हजार वर्ष, दूसरा त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार वर्ष, तीसरा द्वापरयुग 8 लाख 64 हजार वर्ष और चौथा कलयुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का बताया गया है। जब ये चारों युग बीत जाते हैं तो एक चतुर्युगी बनता है और ऐसे ही 71 चतुर्युगी मिलकर एक मन्वंतर बनते हैं I गौर करने की बात यह है कि हर मन्वंतर में मनु,  ऋषि, इंद्र और यहाँ तक की भगवान् के अवतार भी बदलते हैं I 14 मन्वन्तर का 1 कल्प होता है और ब्रह्मा जी का एक दिन 1 कल्प और एक रात 1 कल्प की होती है जब ब्रह्मा जी इसप्रकार 100 साल जीते हैं तो वह भगवान की एक पलक झपकने के समान होता है I

तो देखा आपने सबसे नीचे मानव और सबसे ऊपर ब्रह्मा जी हैं जो सबसे ऊपर होता है उसका दिन उतना ही बड़ा होता है I 

पुराण में चार युगों के बारे में बताया गया है। सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग तथा कलयुग I आइए इनके बारे में विस्तार से जाने और ये भी जाने कि हम कौन से युग में जीवन जी रहे हैं I

1. सतयुग – (कृत युग)

यह पहला एवं सबसे अच्छा युग था। इस युग में अपराध बिल्कुल नहीं था। यह युग सत्य और पूर्णत: शुद्धता वाला समय था। इसमें लोग दयालु, नम्र तथा दानी  थे। चोरी, हत्या, अपराध का नाम तक नहीं था । सतयुग में लोग निरोगी, मजबूत, साहसी, धैर्यवान एवं सर्वगुण संपन्न थे। ऐसा माना जाता हैं  कि सतयुग 17,28,000 वर्ष तक रहा, इस युग का मानव 32 फिट का तथा चार पैरों पर चलता था । सतुयुग के मानव की आयु युग एक लाख वर्ष थी। क्योंकि शायद कोई पापी नहीं था । केवल नेक और पुण्य के काज होते थे। सतयुग में भगवान विष्णु ने  शंखासुर का वध, वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए अवतार लिए थे । 

2. त्रेता युग –

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त्रेता युग दूसरा युग था । सतयुग की अपेक्षा इस युग में नैतिक व सामाजिक मूल्यों में थोड़ी कमी आई। इस समय अनेकों युद्ध लड़ते हुए राज्यों का गठन हुआ। खेती, खनन जैसे कार्यकिये जाते थे। त्रेता का शाब्दिक अर्थ हैं  तीन वस्तुओं का समूह, विष्णु के तीन अवतार  – वामन, परशुराम और राम प्रकट त्रेता युग को प्रमाणित करते हैं । यह काल श्रीराम के देहान्त से साथ समाप्त होता है।

3. द्वापर युग-

द्वापर युग तीसरा युग था। लोग  अन्य युगों की तुलना में काफी कमज़ोर, तामसिक तथा कुरीतियों से ग्रस्त थे । गभीर बीमारियाँ  जीवन का हिस्सा बन गईं थी। मानव काजीवन काल कुछ सौ वर्षों का था। द्वापर युग के दौरान वेद को चार भागों में बाँटा गया था – ऋग्वेद , सोमवेद , यजुर्वेद तथा अथर्ववेद । यह काल कृष्ण के देहान्त से समाप्त होता है।

4. कलयुग

कलयुग चौथा और आखरी युग है। इस युग में जीवन मूल्यों का ह्रास हो चुका है। धरती,जल और वायु सभी को दूषित किया जा चुका है  तामसिक प्रवृति डंका बोल रहा है लूट – पाट, चोरी और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों का डंका बज रहा है। मानव मदिरा और मांस का सेवन पाकर तृप्त हो रहा है। कहा जाता है कि लगभग पाँच हजार साल बाद गंगा नदी सूख जाएगी और वैकुंठ धाम लौट जाएगी। सभी देवी-देवता भी अपने धाम लौट जाएँगें ।

पुराणों में युगों की काल अवधि को लेकर अलग-अलग तथ्य मिलते हैं । हर युग को आने वाले युग से बेहतर था युग की गति दुर्गति में बदलती गई और हम कलयुग में पहुँच गए हैं । कलियुग में हनुमान जी आराधना करें, वे शक्ति के आगार, तेज की साकार प्रतिमा और साहस के प्रतीक है। उन्हें अनजानी पुत्र  तथा संकटहरता भी कहा जाता है । 

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Categories: धर्म

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