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एक व्यक्ति चुप कैसे रह सकता है। आपके मन में सवाल उठेगा। आप जब भी अपने मुंह से शब्द करेंगे कुछ बोलेंगे तो उससे कुछ परिणाम होगा सामने वाला सुनेगा आपको स्वयं भी अपनी बात सुनाई देगी। 

हमारा मानना यह है कि आपके मुंह से जब भी कुछ शब्द निकले तो उन शब्दों का ढांचा कुछ ऐसा हो जो आपके मनोबल को आपके अध्यात्म को आपकी शक्ति को निरंतर बढ़ाएं। 

सवाल मौन रहने का नहीं है कि चुप कैसे रहूं सवाल यह है कि बोलना क्या है जिससे आपकी शक्ति बढ़ती रहे। कभी-कभी सही जगह पर सही बात बोलने से सबका भला होता है और कभी-कभी गलत जगह पर बोल देने से हर किसी को शांति प्राप्त होती है। 

जब आप चुप रहते हैं तब आपके शरीर के भीतर प्राणवायु आ रही है जा रही है। क्यों ना इस प्राणवायु को और अधिक निर्मल और शुद्ध बना दिया जाए।

जैसे जैसे सांस आ रही है जा रही है यदि आप मौन रहकर अपने गुरु का या अपने इष्ट का चिंतन करते हैं तो एक तरह की ऊर्जा पैदा होती है आपके अंदर। परंतु यदि आप नाम जब भी नहीं कर रहे हैं मौन हैं तो भी आपके भीतर ऊर्जा काम कर रही है अलग तरह की। 

तो शब्दों के सही इस्तेमाल को समझना है और यह प्रैक्टिस मौन रहकर ही की जा सकती है। एक घंटा दो घंटा 4 घंटे 5 घंटे पूरा दिन जितनी भी आपकी सामर्थ्य है आपको मौन रहकर अपना दिन बिताना है। यदि आप असमर्थ हैं तो ऐसा कर पाएंगे अन्यथा यह सामर्थ्य पैदा करने की कोशिश करें।